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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 43
अकार्य करणाद्भीतः कार्याणां च विवर्जनात् । अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत्पिबेत् ॥
न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद करने से, तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही मन्त्र प्रकट हो जाने से डरना चाहिये, और जिससे नशा चढ़े, ऐसा पेय नहीं पीना चाहिये।
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