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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 14
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितं च परिणामे यत्तदद्यं भूतिमिच्छता ॥
अतः अपनी उन्नति चाहने वाले पुरुष को वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, जो खाने योग्य हो, तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने) पर पच सके, और पच जाने पर हितकारी हो।
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