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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 13
भक्ष्योत्तम प्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायसम् । रूपाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते ॥
मछली बढ़िया चारे से ढकी हुई, लोहे की काँटी को लोभ में पड़कर निगल जाती है, उस से होने वाले परिणाम पर विचार नहीं करती।
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