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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 17
यथा मधु समादत्ते रक्षन्पुष्पाणि षट्पदः । तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया ॥
जैसे भौरा फूलों की रक्षा करता हुआ ही, उनके मधु का आस्वादन करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनों को कष्ट दिये बिना ही, उनसे धन ले।
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