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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 1
धृतराष्ट्र उवाच । जाग्रतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि । तद्ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलः शुचिः ॥
धृतराष्ट्र बोले - तात! मैं चिन्ता से जलता हुआ अभी तक जाग रहा हूँ, तुम मेरे करने योग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हम लोगों में तुम्हीं धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण हो।
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