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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 61
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्तं चैवाप्यनर्थतः । इन्द्रियैः प्रसृतो बालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ॥
इन्द्रियाँ बश में न होने के कारण, अर्थ को अनर्थ, और अनर्थ को अर्थ समझकर, अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुख को भी सुख मान बैठता है।
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