वाक्संयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मतः ।
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहुभाषितुम् ॥
राजन्! वाणी का पूर्ण संयम, तो बहुत कठिन माना ही गया है, परंतु विशेष अर्थ युक्त, और चमत्कार पूर्ण वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती।
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