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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 20
अनारभ्या भवन्त्यर्थाः के चिन्नित्यं तथागताः । कृतः पुरुषकारोऽपि भवेद्येषु निरर्थकः ॥
कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो निल्य आप्राप्त होने के कारण, आरम्भ करने योग्य नहीं होते, क्योंकि उनके लिये किया हृुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है।
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