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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 4
विदुर उवाच । शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् । अपृष्टस्तस्य तद्ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥
विदुरजी ने कहा - मनुष्यों को चाहिये, कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी कल्याण करने वाली, या अनिष्ट करने वाली अच्छी अथवा बुरी - जो भी बात हो, बता दे।
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