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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 65
बन्धुरात्माऽऽत्पनस्तस्य येनैवात्माऽऽत्मना जितः । स एव नियतो बन्धुः स एव नियतो रिपु: ॥
जिसने स्वयं अपने आत्मा को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। वही सच्चा बन्धु, और वहीं नियत शत्रु है।
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