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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 3
पापाशङ्गी पापमेव नौपश्यन् पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम् । कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथावन् मनीषितं सर्वमजातशत्रोः ॥
विद्वन्! मेरे मन में अनिष्ट की आशङ्का बनी रहती है, इसलिये में सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ, अतः व्याकुल हृदय से में तुमसे पूछ रहा हूँ, अजात शत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं? सो सब ठीक-ठीक बताओ।
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