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अध्याय 2 — द्वितीय पटल

शिव संहिता
57 श्लोक • केवल अनुवाद
मानव शरीर के अन्दर ही सात द्वीपों (जम्बू, शाक, कुश, क्रौंच, शाल्मलि, प्लक्ष और पुष्कर) तथा सुमेरु पर्वत का निवास स्थान है।
नदी, समुद्र, गिरि, क्षेत्रपाल, समस्त ऋषि-मुनि, सम्पूर्ण ग्रह, नक्षत्र, पुण्यदायक तीर्थस्थल, पीठस्थान तथा पीठदेवता आदि सभी की वर्तमानता है। (तात्पर्य यह है कि इस शरीर में ही सभी पुण्यस्थली, तपोभूमि तथा देवविग्रहालय की अवस्थिति है। अतः साधक को शरीरस्थ उन सभी स्थानों से सुपरिचित होकर पुण्य का संचयन करना चाहिए। उसे किसी अन्य स्थान में मन को नहीं दौड़ाना चाहिए।)
सृष्टिकर्ता तथा संहारकर्ता चन्द्र-सूर्य इस शरीर में निरन्तर परिभ्रमण किया करते हैं। शरीरस्थ पंचतत्त्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी) की विद्यमानता भी शरीर में सदैव बनी रहती है।
त्रैलोक्य (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल) के समस्त प्राणी शरीरस्थ सुमेरु के आश्रित होकर अपने अपने कर्मों में लगे रहते हैं। जो पुरुष इन सब बातों को भली प्रकार से जान लेता है वही यथार्थ योगी समझा जाता है।
जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण प्रदेश और सुमेरु पर्वत वर्तमान रहते हैं उसी प्रकार इस देह में भी सब कुछ विद्यमान रहता है। अर्थात् ब्रह्माण्ड और शरीर के मध्य कुछ भी भेद नहीं रहता। इसी कारण शरीर को ब्रह्माण्डसंज्ञक कहा जाता है।
इसी कारण शरीर को ब्रह्माण्डसंज्ञक कहा जाता है। इस शरीरस्थ सुमेरु पर्वत के शिखर पर आठ कलाओं से युक्त चन्द्रमा की स्थिति रहती है। वह चन्द्रमा नीचे की ओर मुख किये निरन्तर अमृत-वर्षा किया करता है। उस अमृत के दो प्रकार होते हैं - एक सूक्ष्म और दूसरा स्थूल।
इस शरीर के परितोषणार्थ इड़ा नाम्नी नाड़ीपथ से जलरूपी मंदाकिनी प्रवहमान रहा करती है जिसके फलस्वरूप शरीर का अभिरक्षण तथा पोषण हुआ करता है।
अमृत किरणों से भरपूर यह इड़ा नाड़ी नासिका के वाम पार्श्व में अवस्थित रहा करती है।
वह विशुद्ध दूध के समान कांतिवान् चन्द्रमा हर्षोल्लासपूर्वक अपने मण्डल से मेरु पर आकर इड़ा नाड़ी के छिद्रमार्ग से शरीर का पोषण करता है।
मेरुदण्ड (रीढ़ास्थि) से नीचे की ओर द्वादश कलाओं से संयुक्त सूर्य की अवस्थिति रहती है। दक्षिणपथ अर्थात् पिंगला नाड़ीपथ से प्रजापति ऊर्ध्वगामी होता है।
चन्द्रमा द्वारा क्षरित होते हुए अमृत को सूर्य अपनी रश्मियों के बल पर अपना ग्रास बनाकर वायुमण्डल में घुल-मिल जाता और समग्र शरीर में परिभ्रमण किया करता है।
यह निर्वाणमूर्ति सूर्य पिंगला नाड़ी के दाएँ भाग में वर्तमान रहता है। यह सृष्टिकारक और संहारक सूर्य लग्नयोग से नाड़ी से द्वारा प्रवाहित रहता है।
मनुष्य के शरीर में प्रधानतया साढ़े तीन लाख नाड़ियां होती है जिनमें चौदह नाड़ियों को मुख्य माना गया है जो इस प्रकार से हैं।
सुषुम्ना, इडा, पिंगला, गांधारी, हस्तजिह्नका, कुहु, सरस्वती, पूषा, शंखिनी, पयस्विनी,
करुणा, अलम्बुषा, विश्वोदरी तथा यशस्विनी। इन चतुर्दश नाड़ियों में भी पिंगला, इड़ा और सुषुम्ना - इन तीनों की प्रमुखता होती है।
उक्त कथित त्रिनाड़ियों (पिंगला, इड़ा, सुषुम्ना) में सुषुम्ना नाड़ी ही सर्वोपरि होती है, क्योंकि यह योगियों के लिए परमप्रिय कही गयी है। इसके अतिरिक्त अन्य जितनी भी नाड़ियाँ है वे सभी शरीर में ही अवस्थित रहती है।
ये तीनों नाड़ियाँ अधोमुखी होकर कमल-तन्तु के समान स्थित रहा करती हैं। ये तीनों ही चन्द्र, सूर्य और अग्निस्वरूपिणी होती हैं तथा मेरुदण्ड के आश्रित रहती हैं।
उन तीनों नाड़ियों के मध्य स्थित रहने वाली चित्रा नाड़ी मुझे परमप्रिय है, क्योंकि वहीं पर सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर ब्रह्मरन्ध्र की विद्यमानता होती है।
वह चित्रा नाड़ी पाँच वर्णों वाली, उज्ज्वल और विशुद्ध है। सुषुम्ना के बीच में अवस्थित वही चित्रा नाड़ी शरीर की उपाधि का मूलभूत कारण भी है।
यही वह दिव्यपथ भी है जिसे मैंने अमृत तथा आनन्दोत्पादक बतलाया है। केवल उसके ध्यानमात्र से ही योगीन्द्रों के पातक विनष्ट हो जाते हैं।
गुदाद्वार से दो अंगुल ऊपर तथा मेढ़ से दो अंगुल नीचे की ओर चार अंगुल विस्तृत एक आधार-कमल वर्तमान रहता है जिसे मूलाधार चक्र भी कहा जाता है।
उस आधार पद्म की कर्णिका में एक त्रिकोणाकार योनि अवस्थित रहती है जिसे सभी शाखों ने परम गोपनीय कहा है। अर्थात् इसे किसी अयोग्य व्यक्ति से नहीं कहना चाहिए।
वह परम देवतास्वरूपिणी कुंडलिनी साढ़े तीन गेंडुरी (घेरा) लगाये सुषुम्ना नाड़ी के बीच में अवस्थित रहती है। वह वक्राकार तथा विद्युत्रेखा वाली होती है।
वह कुंडलिनी सृष्टि संरचना में सतत ही संलग्न रहा करती है। वही वाग्देवीस्वरूपा भी होती है। क्योंकि उसी की सहायता से वाक्योच्चार सम्भव होता है। वह सभी देवों के द्वारा स्तुत्य एवं प्रणमित होती है।
वाम पार्श्वस्थ इड़ा नाम्नी नाड़ी सुषुम्ना को संश्लिष्ट कर दाएँ नासारन्ध्र में चली गयी है।
इसी प्रकार दक्षिण नासारन्ध्र में स्थित पिंगला नाड़ी सुषुम्ना का आश्रय ग्रहण कर वाम नासारन्ध्र में चली जाती है।
सुषुम्ना नाड़ी की अवस्थिति इड़ा और पिंगला नाड़ियों के मध्य रहती है। इस सुषुम्ना के छह स्थानों में क्रमशः छह शक्तियाँ भी विद्यमान रहती हैं जिन्हें डाकिनी, हाकिनी, काकिनी, लाकिनी, राकिनी और शाकिनी के नाम से जाना जाता है।
इन्हीं छह स्थानों में छह कमल भी होते हैं जिसे मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र कहा जाता है। इन सबका ज्ञान योगी अपने योगाभ्यास के द्वारा प्राप्त करता है। सुषुम्ना के भी पाँच स्थान और अनेक नाम बतलाये गये हैं जिसे आवश्यकता पड़ने पर शास्त्रों के द्वारा जाना जा सकता है।
इसके अतिरिक्त अन्य नाड़ियाँ मूलाधार से निकलकर जीभ, मेढ़, नेत्र, पैर के अंगुठे, कान,
कोख, कक्ष, हाथों के अंगुठे, मलद्वार तथा जननेद्रिय आदि स्थानों में जाकर समाप्त हुई है।
इन नाड़ियों की शाखा प्रशाखाओं से उत्पन्न होकर साढ़े तीन लाख नाड़ियाँ क्रमशः अपने-अपने स्थानों में अवस्थित हो जाया करती हैं।
इन सभी भोगवहा नाड़ियों में वायु का संचरण होता रहता है तथा संयोग-वियोग से ओत-प्रोत होकर मानव शरीर में परिव्याप्त रहती हैं।
द्वादश कलाओं से परिपूर्ण सूर्यमण्डल के मध्य में जो अग्नि दहकती रहती है उसी के द्वारा भक्षित खाद्य पदार्थों का परिपाक होता है।
वह वैश्वानर अग्नि मेरे ही तेजोद्भूत है। यह अग्नि समस्त प्राणियों के शरीर में व्याप्त रहकर विविध प्रकार से पाचन-क्रिया का कार्य करती रहती है।
इसी वैश्वानर नामक अग्नि के फलस्वरूप आयु, बल और पुष्टि का वर्धन होता तथा इसी के द्वारा समस्त रोगों का विनष्टीकरण भी हो जाता है।
इस अग्नि को प्रज्वलित करने हेतु किसी सुयोग्य गुरु से दीक्षा लेने के पश्चात् इसमें अन्नाहुति देनी चाहिए। अर्थात् गुरु से ज्ञान प्राप्त कर मानव को संतुलित आहार ग्रहण करने चाहिए।
इस ब्रह्माण्डसंज्ञक देह में अगणित स्थान विद्यमान हैं तथा उन स्थानों के अनेक नाम भी हैं, किन्तु मैंने कुछ प्रमुख स्थानों का ही वर्णन किया है।
शेष सभी शास्त्रानुशीलन से जाने जा सकते हैं। सम्पूर्ण स्थानों एवं उनके नामों का कथन करना मेरे बल-बूते के बाहर है।
इस प्रकार प्रकल्पित शरीर में निवसित जीव अनन्तकाल से चली आ रही वासनारूपी माला में भ्रमण करता हुआ कर्म-बन्धन की जंजीर में जकड़ा रहता है।
वह अनेक प्रकार के गुणों का ग्राही बनकर जगत् के सभी व्यापारों का सम्पादन करता रहता है तथा पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्मफलों का भोग भोगता रहता है।
इस संसार में जितने भी शुभाशुभ कर्म दृष्टिगत होते हैं, उनका मूलभूत कारण केवल कर्म ही होता है। समस्त जीव अपने-अपने कर्मानुसार फलों को भोगते रहते हैं।
काम-क्रोधादि से उत्पन्न मानव-मन में होने वाली सुख-दुःख की अनुभूति का होना भी उसके कर्म का ही फल होता है। अर्थात् शुभ कर्मों द्वारा सुखोपलब्धि तथा अशुभ कर्मों द्वारा दुःखोपलब्धि का होना सुनिश्चित है।
पुण्यदायक कर्मों के करने से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है। पुण्यकारक कर्मों के द्वारा उसे उत्तम भोज्य पदार्थ एवं अन्यान्य बाहरी वस्तुएँ भी स्वयं ही मिल जाया करती हैं।
यह जीव अपने कर्म फलानुसार ही सुख-दुःख भोगने के लिए बाध्य रहता है। पाप-कर्म में आसक्ति से दुःख तथा अनासक्ति से सुख मिलता है।
प्राणी द्वारा कृत कर्म ही सुख-दुःख के रूप में उभर कर उसके समक्ष आता है। कर्ता और भोक्ता में कोई विभेद नहीं होता। अर्थात्‌ प्राणी जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल मिलना भी उसे सुनिश्चित रहता है। आत्मा के माया द्वारा उपहित होने पर इस सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
जीव के फलोपभोग का जो समय पहले से निश्चित रहता है उसी समय में जीव को जन्म ग्रहण कर अपने कर्मों के फल का भोग करना पड़ता है। जिस प्रकार दृष्टिदोष के परिणामस्वरूप सीपी में चाँदी का आभास होता है उसी प्रकार कर्मदोष के कारण ही जीव को ब्रह्म में इस मिथ्या जगत का आभास होने लगता है।
इस संसार में जो कुछ भी वस्तुएँ प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती हैं, वे सभी भ्रमात्मक होती हैं। इस भ्रम के न मिटने तक यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
प्रत्येक मनुष्य इसी भ्रम-जाल में उलझकर रह जाता है और यही बंधन का मूल कारण बनता है। मनुष्य की बुद्धि माया के आवरण से आच्छादित रहने के फलस्वरूप वह आत्म-साक्षात्कार नहीं कर पाता, यह कथन नितान्त सत्य है।
जगत् के दृश्यमान पदार्थ के नष्ट न हो जाने तक ब्रह्मात्म का अनुभव कदापि नहीं हो सकता। आत्मा के प्रत्यक्षीकरण द्वारा ही ब्रह्म की प्रत्यक्षता सम्भव होती है, किन्तु सांसारिक भ्रम का निवारण होना अत्यन्त दुष्कर है।
इस भ्रम का विनाश तभी हो सकता है जब आत्म-दर्शन हो जाय। सीप में चाँदी होने का भ्रम तभी मिट सकता है जब सीप का प्रत्यक्षीकरण हो जाय।
मनुष्य में जब तक आत्म-ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो जाती तब तक उसे सभी जीव अनेक रूपों में दृष्टिगत होते रहते हैं।
अतः इस कर्मार्जित शरीर की विद्यमानता रहने तक मानव को मोक्षसाधन का मार्ग ढूंढ लेना चाहिए। यदि वह मुक्ति-साधना में अग्रसर न हो सके तो उसका जन्म लेना ही निरर्थक है। ऐसी स्थिति में वह धरती पर केवल भार-स्वरूप बना रहता है।
मानव-मन में जिस प्रकार की वासना निहित रहती है उसी से प्रेरित होकर वह शुभाशुभ कर्म करने में निरत रहता है और यही वासना उसके जन्म-मरण का कारण भी बनती है।
अतः इस अथाह संसार-सागर से पार जाने के अभिलाषी पुरुष को सदैव ही निष्काम भाव से कर्म करने चाहिए।
विषयासक्त तथा विलासी व्यक्ति सर्वदा ही विषय-भोग के सुख में निमग्न रहा करते हैं। उनके मुख से मोक्ष-विषयक एक शब्द भी उच्चरित नहीं होते। अर्थात् वे सदैव ही पापकर्म में लिप्त रहा करते हैं।
आत्मा के द्वारा आत्मदर्शन करने वाले ज्ञानवान पुरुष को जब कोई अन्य पदार्थ दिखलाई न दे तो उसे कर्मत्याग करने में कोई दोष नहीं होता, ऐसा मेरा अभिमत है।
ज्ञानोत्पत्ति होने पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य आदि सभी मनोविकार ज्ञान में विलीन हो जाते हैं और केवल आत्मज्ञान का आलोक ही शेष रह जाता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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