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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 33
सूर्यमंडलमध्यस्थः कला द्वादशसंयुतः । बस्तिदेशे ज्वलद्वह्निर्वर्तते चान्नपाचकः ।।
द्वादश कलाओं से परिपूर्ण सूर्यमण्डल के मध्य में जो अग्नि दहकती रहती है उसी के द्वारा भक्षित खाद्य पदार्थों का परिपाक होता है।
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