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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 51
यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे निरञ्जने । तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्यन्ते विविधानि च ।।
मनुष्य में जब तक आत्म-ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो जाती तब तक उसे सभी जीव अनेक रूपों में दृष्टिगत होते रहते हैं।
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