ततः कर्म बलात्पुंसः सुखं वा दुःखमेव च ।
पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति निश्चितम् ।।
यह जीव अपने कर्म फलानुसार ही सुख-दुःख भोगने के लिए बाध्य रहता है। पाप-कर्म में आसक्ति से दुःख तथा अनासक्ति से सुख मिलता है।
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