जीव के फलोपभोग का जो समय पहले से निश्चित रहता है उसी समय में जीव को जन्म ग्रहण कर अपने कर्मों के फल का भोग करना पड़ता है। जिस प्रकार दृष्टिदोष के परिणामस्वरूप सीपी में चाँदी का आभास होता है उसी प्रकार कर्मदोष के कारण ही जीव को ब्रह्म में इस मिथ्या जगत का आभास होने लगता है।
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