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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 47
स वासनाभ्रमोत्यन्त्रोन्मूलनातिसमर्थनम् । उत्पन्नं चेदीदृशं स्याज्ज्ञानंमोक्ष प्रसाधनम् ।।
इस संसार में जो कुछ भी वस्तुएँ प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती हैं, वे सभी भ्रमात्मक होती हैं। इस भ्रम के न मिटने तक यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
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