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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 53
यादृशी वासना मूला वर्त्तते जीवनसङ्गिनी । तादृशं वहते जन्तुः कृत्याकृत्यविधौ भ्रमम् ।।
मानव-मन में जिस प्रकार की वासना निहित रहती है उसी से प्रेरित होकर वह शुभाशुभ कर्म करने में निरत रहता है और यही वासना उसके जन्म-मरण का कारण भी बनती है।
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