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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 3
सृष्टिसंहारकर्तारी भ्रमन्तौ शशिभास्करौ । नभोवायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ।।
सृष्टिकर्ता तथा संहारकर्ता चन्द्र-सूर्य इस शरीर में निरन्तर परिभ्रमण किया करते हैं। शरीरस्थ पंचतत्त्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी) की विद्यमानता भी शरीर में सदैव बनी रहती है।
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