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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 45
न तद्भिन्नो भवेत् सोऽपि तद्भिन्नो न तु किञ्चन । मायोपहितचैतन्यात्सर्वं वस्तु प्रजायते ।।
प्राणी द्वारा कृत कर्म ही सुख-दुःख के रूप में उभर कर उसके समक्ष आता है। कर्ता और भोक्ता में कोई विभेद नहीं होता। अर्थात्‌ प्राणी जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल मिलना भी उसे सुनिश्चित रहता है। आत्मा के माया द्वारा उपहित होने पर इस सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
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