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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 49
साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात् साक्षात्कारिणि नाशयेत् । स हि नास्तीति संसारे भ्रमो नैव निवर्तते ।।
जगत् के दृश्यमान पदार्थ के नष्ट न हो जाने तक ब्रह्मात्म का अनुभव कदापि नहीं हो सकता। आत्मा के प्रत्यक्षीकरण द्वारा ही ब्रह्म की प्रत्यक्षता सम्भव होती है, किन्तु सांसारिक भ्रम का निवारण होना अत्यन्त दुष्कर है।
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