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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 34
वैश्वानराग्निरेषो वै मम तेजोंशसम्भवः । करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः ।।
वह वैश्वानर अग्नि मेरे ही तेजोद्भूत है। यह अग्नि समस्त प्राणियों के शरीर में व्याप्त रहकर विविध प्रकार से पाचन-क्रिया का कार्य करती रहती है।
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