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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 55
विषयासक्तपुरुषा विषयेषु सुखेप्सवः । वाचाभिरुद्धनिर्वाणा वर्तन्ते पापकर्मणि ।।
विषयासक्त तथा विलासी व्यक्ति सर्वदा ही विषय-भोग के सुख में निमग्न रहा करते हैं। उनके मुख से मोक्ष-विषयक एक शब्द भी उच्चरित नहीं होते। अर्थात् वे सदैव ही पापकर्म में लिप्त रहा करते हैं।
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