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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 11
पीयूषरश्मिनिर्यासं धातूंश्च प्रसति धुवम् । समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्वविग्रहे ।।
चन्द्रमा द्वारा क्षरित होते हुए अमृत को सूर्य अपनी रश्मियों के बल पर अपना ग्रास बनाकर वायुमण्डल में घुल-मिल जाता और समग्र शरीर में परिभ्रमण किया करता है।
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