चन्द्रमा द्वारा क्षरित होते हुए अमृत को सूर्य अपनी रश्मियों के बल पर अपना ग्रास बनाकर वायुमण्डल में घुल-मिल जाता और समग्र शरीर में परिभ्रमण किया करता है।
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