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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 31
एताभ्य एव नाडीभ्यः शाखोपशाखतः क्रमात् । सार्धं लक्षत्रयं जातं यथाभागं व्यवस्थितम् ।।
इन नाड़ियों की शाखा प्रशाखाओं से उत्पन्न होकर साढ़े तीन लाख नाड़ियाँ क्रमशः अपने-अपने स्थानों में अवस्थित हो जाया करती हैं।
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