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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 32
एता भोगवहा नाड्यो वायुसञ्चारदक्षकाः । ओतप्रोताभिसंव्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन् कलेवरे ।।
इन सभी भोगवहा नाड़ियों में वायु का संचरण होता रहता है तथा संयोग-वियोग से ओत-प्रोत होकर मानव शरीर में परिव्याप्त रहती हैं।
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