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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 6
वर्ततेऽहर्मिशं सोऽपि सुधां वर्षत्यधोमुखः । ततोऽमृतं द्विधाभूतं याति सूक्ष्मं यथा च वै ।।
इसी कारण शरीर को ब्रह्माण्डसंज्ञक कहा जाता है। इस शरीरस्थ सुमेरु पर्वत के शिखर पर आठ कलाओं से युक्त चन्द्रमा की स्थिति रहती है। वह चन्द्रमा नीचे की ओर मुख किये निरन्तर अमृत-वर्षा किया करता है। उस अमृत के दो प्रकार होते हैं - एक सूक्ष्म और दूसरा स्थूल।
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