जगत्संसृष्टिरूपा सा निर्माणे सततोद्यता ।
वाचामवाच्या वाग्देवी सदा देवैनमस्कृता ।।
वह कुंडलिनी सृष्टि संरचना में सतत ही संलग्न रहा करती है। वही वाग्देवीस्वरूपा भी होती है। क्योंकि उसी की सहायता से वाक्योच्चार सम्भव होता है। वह सभी देवों के द्वारा स्तुत्य एवं प्रणमित होती है।
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