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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 30
कुक्षिकक्षाङ्गुष्ठवर्णं सर्वाङ्ग पायुकुक्षिकम् । लब्धान्ता वै निवर्तन्ते यथादेशसमुद्भवाः ।।
कोख, कक्ष, हाथों के अंगुठे, मलद्वार तथा जननेद्रिय आदि स्थानों में जाकर समाप्त हुई है।
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