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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 4
त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वाणि देहतः । मेरुं संवेष्ट्व सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते । जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः ।।
त्रैलोक्य (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल) के समस्त प्राणी शरीरस्थ सुमेरु के आश्रित होकर अपने अपने कर्मों में लगे रहते हैं। जो पुरुष इन सब बातों को भली प्रकार से जान लेता है वही यथार्थ योगी समझा जाता है।
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