प्रत्येक मनुष्य इसी भ्रम-जाल में उलझकर रह जाता है और यही बंधन का मूल कारण बनता है। मनुष्य की बुद्धि माया के आवरण से आच्छादित रहने के फलस्वरूप वह आत्म-साक्षात्कार नहीं कर पाता, यह कथन नितान्त सत्य है।
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