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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 48
साक्षाद्वै शेषदृ‌ष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विभ्रमे । करणंनान्यथायुक्त्या सत्यंसत्यंमयोदितम् ।।
प्रत्येक मनुष्य इसी भ्रम-जाल में उलझकर रह जाता है और यही बंधन का मूल कारण बनता है। मनुष्य की बुद्धि माया के आवरण से आच्छादित रहने के फलस्वरूप वह आत्म-साक्षात्कार नहीं कर पाता, यह कथन नितान्त सत्य है।
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