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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 39
इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्वगः । अनादिवासनामालाऽ लंकृतः कर्मशृङ्खलः ।।
इस प्रकार प्रकल्पित शरीर में निवसित जीव अनन्तकाल से चली आ रही वासनारूपी माला में भ्रमण करता हुआ कर्म-बन्धन की जंजीर में जकड़ा रहता है।
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