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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 43
पुण्योपरक्त चैतन्ये प्राणान् प्रीणाति केवलम् । बाह्ये पुण्यतमं प्राप्य भोज्यवस्तु स्वयं भवेत् ।।
पुण्यदायक कर्मों के करने से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है। पुण्यकारक कर्मों के द्वारा उसे उत्तम भोज्य पदार्थ एवं अन्यान्य बाहरी वस्तुएँ भी स्वयं ही मिल जाया करती हैं।
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