अतः इस कर्मार्जित शरीर की विद्यमानता रहने तक मानव को मोक्षसाधन का मार्ग ढूंढ लेना चाहिए। यदि वह मुक्ति-साधना में अग्रसर न हो सके तो उसका जन्म लेना ही निरर्थक है। ऐसी स्थिति में वह धरती पर केवल भार-स्वरूप बना रहता है।
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