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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 40
नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारकारकः । पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति विविधानि च ।।
वह अनेक प्रकार के गुणों का ग्राही बनकर जगत् के सभी व्यापारों का सम्पादन करता रहता है तथा पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्मफलों का भोग भोगता रहता है।
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