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शिव संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 5
ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यवस्थितः । मेरुशृद्खे सुधारश्िमर्बहिरष्टकलायुतः ।
जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण प्रदेश और सुमेरु पर्वत वर्तमान रहते हैं उसी प्रकार इस देह में भी सब कुछ विद्यमान रहता है। अर्थात् ब्रह्माण्ड और शरीर के मध्य कुछ भी भेद नहीं रहता। इसी कारण शरीर को ब्रह्माण्डसंज्ञक कहा जाता है।
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