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अध्याय 58 — अथ प्रतिमालक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
57 श्लोक • केवल अनुवाद
जालान्तरगत सूर्यकिरण में जो धूलि दिखाई देती है, उसको 'परमाणु' जानना चाहिये। यह सब प्रमाणों में पहला प्रमाण होता है।
आठ परमाणु का रज, आठ रज का बालाग्र, आठ बालाग्र की लिक्षा, आठ लिक्षा का यूक, आठ यूक का यव और आठ यव का एक अंगुल होता है तथा एक अंगुल को संख्या होती है।
देवालय के द्वार की अष्टमांशोन ऊँचाई की तिहाई, तुल्य पिण्डिका (पीठिका ) और द्विगुणित पीठिकातुल्य प्रतिमा होती है।
प्रतिमा की ऊँचाई को बारह भाग करके फिर प्रत्येक भाग के नव-नव भाग करे। इस तरह एक-एक अंगुल का भाग बन जायगा; क्योंकि समस्त प्रतिमायें अपने-अपने अंगुलप्रमाण से १०८ अंगुल की होती हैं। अपने अंगुलप्रमाण से प्रतिमा का मुख बारह अंगुल चौड़ा और चौदह अंगुल लम्बा बनाना चाहिये। यह द्रविड देश का मान कहा गया है।
प्रतिमा की नासिका, ललाट, ठोड़ी, गरदन और कान चार-चार अंगुल लम्बे तथा हनु और चिबुक (ठोड़ी) दो-दो अंगुल विस्तार वाला होना चाहिये।
माथे की चौड़ाई आठ अंगुल, दोनों तरफ कनपटी की चौड़ाई दो-दो अंगुल और लम्बाई चार-चार अंगुल तथा दोनों कानों की चौड़ाई दो-दो अंगुल बनानी चाहिये ।
नेत्र के प्रान्तभाग से भ्रू के समानान्तर सूत्र में साढे चार अंगुल पर कान का अग्रभाग बनाना चाहिये तथा कान के छेद और सुकुमारक (कान के छेद के समीप का उन्नत मार्ग) को नेत्र-प्रबन्ध (प्रदूषिका) के समान बनाना चाहिये।
वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि आँख और कान का अन्तर चार अंगुल, नीचे का ओंठ एक अंगुल और ऊपर का आधा अंगुल बनाना चाहिये।
आषा अंगुल विस्तार गोच्छा और चार अंगुल दैध्यं मुख बनाना चाहिये। साथ ही हेद अंगुल विस्तार अध्यात्त (अविस्तृत) मुख और तीन अंगुल विस्तार व्यात्त (नृसिंह आदि देवताओं का विस्तृत) मुख बनाना चाहिये ।
नासिका के दोनों पुट दो-दो अंगुल, पुटों के अग्रभाग से नासिका चार अंगुल, नासिका की ऊँचाई दो अंगुल और दोनों नेत्रों का अन्तर चार अंगुल जानना चाहिये।
नेत्र का कोश दो-दो अंगुल, नेत्र के तृतीयांशसम तारा, नेत्र के पश्चम अंश के बराबर दृक्तारा ( नेत्र और तारा का मध्यवर्ती भाग) और नेत्रों का विकाश एक अंगुल होता है।
एक भौं के अन्तभाग से दूसरे भौं के अन्तभाग तक दश अंगुल, भौं की चौड़ाई आधा अंगुल, भौ के मध्यभाग दो अंगुल
बत्तीस अंगुल लम्बा और चौदह अंगुल चौड़ा शिर बनाना चाहिये। चित्र में केवल बारह अंगुल शिर दिखाई देता है। शेष बीस अंगुल पिछला भाग नहीं दिखाई देता।
माथे पर ध्रुबन्ध के समान आधा अंगुल चौड़ी केशरेखा और नेत्र के अन्त में एक अंगुल तुल्य करवीरक (दूषिका) बनाना चाहिये।
नग्रजित् आचार्य ने केशरेखासहित मुख का विस्तार सोलह अंगुल, ग्रीवा का विस्तार दश अंगुल और लम्बाई इक्कीस अंगुल कहा है।
कण्ठ के अधोभाग से हृदय तक, हृदय से नाभि तक और नाभि के मध्य से लिङ्ग के मध्य तक बारह अंगुल का अन्तर रखना चाहिये ।
ऊरु (घुटनों का ऊपरी प्रदेश) और जंघा (जाँघ) चौबीस-चौबीस अंगुल, जानु ( घुटने ) और कपिच्छ चार-चार अंगुल तथा पाँव की गाँठी से नीचे तक भी चार-चार अंगुल का बनाना चाहिये।
बारह अंगुल लम्बे और छः अंगुल चौड़े पाँव, पाँव के अँगूठे तीन अंगुल लम्बे और प्रदेशिनी ( अंगूठे के समीप की अंगुली) तीन अंगुल लम्बी बनाना चाहिये।
प्रदेशिनी से अष्टांश-अष्टांश कम करके क्रम से शेष तीन अंगुलियाँ बनानी चाहिये। अंगूठे की ऊँचाई सया अंगुल और शेष अंगुलियों की ऊँचाई उसी के अनुपात से कुछ- कुछ कम करके बनानी चाहिये।
प्रतिया के लक्षणों को जानने वालों ने अंगूठे के नख की लम्बाई पौन अंगुल और शेष अंगुलियों की लम्बाई आधा अंगुल अथवा कुछ-कुछ कम करके बनाने का विधान बताया है, जिससे कि प्रतिमा सुन्दर दिखाई दे।
जाँघ के आगे के भाग की मोटाई चौदह अंगुल और विस्तार पाँच अंगुल तथा मध्य भाग का विस्तार आठ अंगुल और मोटाई इक्कीस अंगुल होती है।
घुटने के मध्य भाग विस्तार आठ अंगुल, मोटाई चौबीस अंगुल और ऊरु के मध्य का विस्तार चौद अंगुल एवं परिधि अट्ठाईस अंगुल होती है।
कमर की चौड़ाई अट्ठारह अंगुई और परिधि चौवालीस अंगुल होती है तथा नाभिभाग का विस्तार और वेध एक-एक अंगुल का होता है।
नाभिस्थान की मोटाई बयालीस अंगुल, दोनों स्तनों का अन्तर सोलह अंगुल और स्तनों के ऊपर बगल में छः-छः अंगुल के कोख होते हैं।
गरदन से लेकर दोनों कन्धों की लम्बाई आठ अंगुल तथा बारह अंगुल बाहु और प्रबाहु (बाहु के समीपवर्ती बाहु ) ६) बनानी चाहिये। बाहु का विस्तार छः अंगुल और प्रबाहु का विस्तार चार अंगुल बनाना चाहिये।
बाहुमूल की मोटाई सोलह अंगुल, प्रकोष्ठ की मोटाई बारह अंगुल, हथेली की चौड़ाई छः अंगुल और लम्बाई सात अंगुल बनानी चाहिये ।
मध्यमा पाँच अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका पर्व के आधे से रहित पाँच अंगुल और कनिष्ठिका एक पर्व से रहित पाँच अंगुल लम्बी होती है।
अंगूठे में दो पर्व एवं शेष चार अंगुलियों में तीन-तीन पर्व बनाने चाहिये तथा अपने-अपने पर्व के आधे के तुल्य नखों का परिमाण बनाना चाहिये ।
प्रतिमा के भूषण, वेष, अलंकार और मूर्ति अपने-अपने देश के अनुरूप बनाने चाहिये; क्योंकि शुभ लक्षणों से युत प्रतिमा उसका निर्माण करने वाले की सदा उन्नति करती है।
दशरथतनय राम और विरोचन के तनय बलि की प्रतिमा एक सौ बीस अंगुल लम्बी बनानी चाहिये। शेष समस्त प्रतिमायें एक सी आठ अंगुल लम्बी उत्तम, छियानबे अंगुल लम्बी मध्यम और चौरासी अंगुल लम्बी अधम होती हैं।
विष्णु की प्रतिमा अष्टभुज, चतुर्भुज या द्विभुज बनानी चाहिये। उनके वक्षःस्थल को श्रीवत्सचिह्न और कौस्तुभ मणि से शोभित करना चाहिये।
अतसी-पुष्प के समान श्याम वर्ण, पीताम्बर पहनी हुई, प्रसन्न मुख, पुष्ट कण्ठ, वक्षःस्थल, कन्धा और भुजा वाली, दाहिने तीन हाथों में
खड्ग, गदा और शर धारण की हुई, चौथा हाथ अभय मुद्रा से युत, बाईं तरफ के चार हाथों से धनुष, ढाल, चक्र और शंख धारण की हुई अष्टभुज विष्णु की प्रतिमा बनानी चाहये।
चतुर्भुज विष्णु की प्रतिमा बनानी हो तो दाहिने तरफ के एक हाथ में अभय मुद्रायुत, दूसरे में गदा धारण की हुई, बाई तरफ के एक हाथ में शंख और दूसरे में चक्र धारण की हुई मूर्ति बनानी चाहिये।
द्विभुज प्रतिमा बनानी हो तो दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और बाँये में शंख धारण की हुई पूर्ति बनानी चाहिये। ऐश्वर्य को चाहने वाले मनुष्य को इसी तरह विष्णु की प्रतिमा बनानी चाहिये।
बलदेव की प्रतिमा के एक हाथ में हल धारण कराना चाहिये। मद से चलायमान नेत्र बनाना चाहिये। उसके एक कान में कुण्डल धारण कराना चाहिये तथा प्रतिमा को शंख, चन्द्र या मृणाल के समान सफेद वर्ण वाला बनाना चाहिये ।
बलदेव और कृष्ण की प्रतिमा के मध्य में 'एकानंशा' नाम की देवी की प्रतिमा बनानी चाहिये। उसका बाँया हाथ उसके कमर पर रखना चाहिये और दाहिने हाथ में कमल धारण कराना चाहिये।
चतुर्भुजा एकानंशा देवी के बाईं तरफ एक हाथ में पुस्तक और दूसरे में कमल तथा दाईं तरफ एक हाथ में वर देने वाली मुद्रा और दूसरे में माला धारण कराना चाहिये।
अष्टभुजा एकानंशा देवी की मूर्ति के बायें चार हाथों में क्रम से कमण्डलु, धनुष, कमल और पुस्तक तथा दाहिने चार हाथों में क्रम से वर देने वाली मुद्रा, बाण, दर्पण और अक्षसूत्र धारण कराना चाहिये।
शाम्ब की प्रतिमा को गदा और प्रद्युम्न की प्रतिमा को धनुष धारण कराना चाहिये। इन दोनों प्रतिमाओं को द्विभुज तथा सुन्दर बनाना चाहिये तथा इन दोनों के ही स्त्रियों की भी प्रतिमा बनानी चाहिये, जिनके हाथों में खेटक (फर) और खड्ग धारण कराना चाहिये।
ब्रह्मा की मूर्ति के एक हाथ में कमण्डलु धारण कराकर उसको चार मुख वाला बनाना चाहिये और उसे कमलपुष्प के आसन पर बैठाना चाहिये। कार्तिकेय को बालक के स्वरूप का बनाना चाहिये एवं उनके हाथ में शक्ति (वीं) और मयूरयुक्त ध्वजा धारण कराना चाहिये।
इन्द्र के हाथी (ऐरावत ) की प्रतिमा सफेद और चार दाँतों से युत बनानी चाहिये तथा इन्द्र की प्रतिमा के हाथ में वज्र धारण कराना चाहिये और ललाट के मध्य में तिरछा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये।
शिव जी की प्रतिमा के मस्तक पर चन्द्रकला बनानी चाहिये, उनकी ध्वजा में वृष का चिह्न बनाना चाहिये। उनके ललाट में खड़ा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में पिनाक नामक धनुष धारण कराना चाहिये अथवा उनकी बाई तरफ आधे भाग में पार्वती की प्रतिमा बनानी चाहिये।
बुद्ध की प्रतिमा के हाथ एवं पाँव में कमल का चिह्न, प्रसत्रमुख, बहुत छोटे-छोटे शिर के बालों से युत, पद्यासन से बैठी हुई और संसार के पिता के समान दिखाई देने वाली बनानी चाहिये।
जानु तक लम्बी भुजाओं से युत, श्रीवत्स-चिह्न से शोभित, शान्त, दिगम्बर, तरुण और सुन्दर जिन की प्रतिमा बनानी चाहिये।
सूर्य की प्रतिमा के नासिका, ललाट, जड्डा, ऊरु, गाल और वक्षःस्थल ऊँचा, उत्तर देशवासियों की तरह वेष
पाँव से लेकर छाती तक चोलक से गुप्त, दोनों भुजाओं में दो नखरूप कमलों से युत्, शर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में वियद्र- ( सारसन) युक्त हार,
कमली दर के समान मुखकान्ति, कञ्शुक से आच्छादित शरीर, ईषद हास्ययुक्त प्रसन्न मुख और रत्नों से दीप्यमानं कान्ति बनानी चाहिये। इस तरह बना हुआ सूर्य बनाने वाले के लिये शुभकारक होता है।
एक हाथ ऊँची सूर्य की प्रतिमा शुभ, दो हाथ ऊँची धन देने वाली तथा तीन हाथ ऊँची प्रतिमा क्षेम और सुभिक्ष के लिये होती है।
अधिक अंग वाली प्रतिमा राजा से भय, हीनांग प्रतिमा बनाने वाले को रोगी, कृश उदर वाली प्रतिमा क्षुधा का भय और कुश अंग वाली प्रतिमा धन का नाश करती है।
क्षत प्रतिमा बनाने वाले की शस्त्र से मृत्यु, बायीं ओर झुकी हुई प्रतिमा बनाने वाले की पत्नी का नाश और दाहिनी तरफ झुकी हुई प्रतिमा आयु का नाश करती है। प्रतिमा की दृष्टि ऊपर की तरफ हो
ऊपर की तरफ हो तो बनाने वाले को अन्धा और नीचे की तरफ हो तो बनाने वाले को चिन्तित करती है। सूर्य को प्रतिमा के सम्बन्ध में उक्त शुभाशुभ फल ही अन्य प्रतिमाओं के सम्बन्ध में भी जानना चाहिये।
लिङ्ग की परिधि को लम्बाई में सूत्र से नाप कर उसके तुल्य पत्थर, लकड़ी या मणि का लिङ्ग बनाना चाहिये। उसको तीन भाग करके मूल का प्रथम भाग चतुरस्र, मध्य भाग अष्टास्त्र और ऊपर का भाग गोल बनाना चाहिये। प्रतिमा के
प्रतिमा के चतुरस्त्र भाग को भूमि में गाड़ना चाहिये, अष्टास्त्र भाग को पिण्डिका (जलहरी = जलघरी) के गड्ढे में रखना चाहिये और वर्तुल भाग को ऊपर रखना चाहिये। ऊपर के दृश्य वर्तुल भाग की ऊँचाई के तुल्य ही गड्ढे के चारो और पीठिका बनानी चाहिये।
यदि शिवलिङ्ग पतला या लम्बा हो तो देश का नाश, दोनों तरफ से खण्डित हो तो नगर का नाश और क्षत मस्तक वाला हो तो स्वामी का नाश करता है।
मातृगणों की प्रतिमा अपने नाम में जो देवता हों, उनके सदृश बनानी चाहिये। जैसे ब्रह्मा के तुल्य ब्राह्मी की, इन्द्र के तुल्य इन्द्राणी की, शिव के तुल्य शिवा की इत्यादि; परन्तु इन प्रतिमाओं में स्तन-शोभा, मध्य में कृश और पृथु नितम्ब भी बना देना चाहिये, जिससे कि त्री की शोभा प्रतिमा में अवतरित हो जाय। घोड़े पर सवार और मृगयारूप क्रीडा में संलग्न परिवार वाली प्रतिमा रेवन्त (सूर्य के पुत्र) की बनानी चाहिये।
यम की प्रतिमा को हाथ में दण्ड देकर भैंस पर चढ़ाना चाहिये। वरुण की प्रतिमा को हंस पर चढ़ा कर हाथ में पाश धारण कराना चाहिये। कुबेर की प्रतिमा मनुष्य पर चढ़ी हुई, बायीं ओर झुकी हुई किरीट वाली और बड़े उदर वाली बनानी चाहिये।
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