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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 14
द्वात्रिंशत् परिणाहाच्चतुर्दशायामतोऽङ्गुलानि शिरः । द्वादश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विंशतिरदृश्याः ॥
माथे पर ध्रुबन्ध के समान आधा अंगुल चौड़ी केशरेखा और नेत्र के अन्त में एक अंगुल तुल्य करवीरक (दूषिका) बनाना चाहिये।
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