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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 10
द्वयङ्गुलतुल्यौ नासापुटौ च नासा पुटाप्रतो ज्ञेया । स्याट् द्वयङ्गुलमुच्छ्रायश्चतुरङ्गुलमन्तरं चाक्ष्णोः ॥
नासिका के दोनों पुट दो-दो अंगुल, पुटों के अग्रभाग से नासिका चार अंगुल, नासिका की ऊँचाई दो अंगुल और दोनों नेत्रों का अन्तर चार अंगुल जानना चाहिये।
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