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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 47
बिभ्राणः स्वकररुहे बाहुभ्यां पङ्कजे मुकुटधारी । कुण्डलभूषितवदनः प्रलम्बहारो वियद्रवृतः ॥
पाँव से लेकर छाती तक चोलक से गुप्त, दोनों भुजाओं में दो नखरूप कमलों से युत्, शर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में वियद्र- ( सारसन) युक्त हार,
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