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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 11
द्वयङ्गुलमितोऽक्षिकोशो द्वे नेत्रे तत्त्रिभागिका तारा । दृक्तारा पश्चांशो नेत्रविकाशोऽङ्गुलं भवति ॥
नेत्र का कोश दो-दो अंगुल, नेत्र के तृतीयांशसम तारा, नेत्र के पश्चम अंश के बराबर दृक्तारा ( नेत्र और तारा का मध्यवर्ती भाग) और नेत्रों का विकाश एक अंगुल होता है।
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