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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 18
द्वादशदीधीं षट् पृथुतया च पादौ त्रिकायताङ्गुष्ठौ । पश्चाङ्गुलपरिणाही प्रदेशिनी त्र्यङ्गुलं दीर्घा ॥
बारह अंगुल लम्बे और छः अंगुल चौड़े पाँव, पाँव के अँगूठे तीन अंगुल लम्बे और प्रदेशिनी ( अंगूठे के समीप की अंगुली) तीन अंगुल लम्बी बनाना चाहिये।
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