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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 42
शुक्लश्चतुर्विषाणो द्विपो महेन्द्रस्य वज्रपाणित्वम् । तिर्यग् ललाटसंस्थं तृतीयमपि लोचनं चिह्नम् ॥
इन्द्र के हाथी (ऐरावत ) की प्रतिमा सफेद और चार दाँतों से युत बनानी चाहिये तथा इन्द्र की प्रतिमा के हाथ में वज्र धारण कराना चाहिये और ललाट के मध्य में तिरछा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये।
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