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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 56
मातृगणः कर्तव्यः स्वनामदेवानुरूपकृतचिह्नः । रेवन्तोऽश्वारूढो मृगयाक्रीडादिपरिवारः ॥
मातृगणों की प्रतिमा अपने नाम में जो देवता हों, उनके सदृश बनानी चाहिये। जैसे ब्रह्मा के तुल्य ब्राह्मी की, इन्द्र के तुल्य इन्द्राणी की, शिव के तुल्य शिवा की इत्यादि; परन्तु इन प्रतिमाओं में स्तन-शोभा, मध्य में कृश और पृथु नितम्ब भी बना देना चाहिये, जिससे कि त्री की शोभा प्रतिमा में अवतरित हो जाय। घोड़े पर सवार और मृगयारूप क्रीडा में संलग्न परिवार वाली प्रतिमा रेवन्त (सूर्य के पुत्र) की बनानी चाहिये।
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