आषा अंगुल विस्तार गोच्छा और चार अंगुल दैध्यं मुख बनाना चाहिये। साथ ही
हेद अंगुल विस्तार अध्यात्त (अविस्तृत) मुख और तीन अंगुल विस्तार व्यात्त (नृसिंह
आदि देवताओं का विस्तृत) मुख बनाना चाहिये ।
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