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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 9
अर्धाङ्गुला तु गोच्छा वक्त्रं चतुरङ्गुलायतं कार्यम् । विपुलं तु सार्थमङ्गुलमव्यात्तं त्र्यङ्गुलं व्यात्तम् ॥
आषा अंगुल विस्तार गोच्छा और चार अंगुल दैध्यं मुख बनाना चाहिये। साथ ही हेद अंगुल विस्तार अध्यात्त (अविस्तृत) मुख और तीन अंगुल विस्तार व्यात्त (नृसिंह आदि देवताओं का विस्तृत) मुख बनाना चाहिये ।
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