कण्ठाद् द्वादश हृदयं हृदयान्नाभी च तत्प्रमाणेन । नाधीमध्याद् मेवान्तरं च तत्तुल्यमेवोक्तम् ॥
कण्ठ के अधोभाग से हृदय तक, हृदय से नाभि तक और नाभि के मध्य से लिङ्ग के मध्य तक बारह अंगुल का अन्तर रखना चाहिये ।
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