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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 44
पद्माङ्कितकरचरणः प्रसन्नमूर्तिः सुनीचकेशश्च । पद्मासनोपविष्टः पितेव जगतो भवति बुद्धः ॥
बुद्ध की प्रतिमा के हाथ एवं पाँव में कमल का चिह्न, प्रसत्रमुख, बहुत छोटे-छोटे शिर के बालों से युत, पद्यासन से बैठी हुई और संसार के पिता के समान दिखाई देने वाली बनानी चाहिये।
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