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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 8
चतुरङ्गुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोऽङ्गुलप्रमाणस्तस्यार्धेनोत्तरोष्ठ श्च ॥
वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि आँख और कान का अन्तर चार अंगुल, नीचे का ओंठ एक अंगुल और ऊपर का आधा अंगुल बनाना चाहिये।
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