ऊरू चाङ्गलमानैश्चतुर्युता विंशतिस्तथा जने । जानुकपिच्छे चतुरङ्गुले च पादौ च तत्तुल्यौ ॥
ऊरु (घुटनों का ऊपरी प्रदेश) और जंघा (जाँघ) चौबीस-चौबीस अंगुल, जानु ( घुटने ) और कपिच्छ चार-चार अंगुल तथा पाँव की गाँठी से नीचे तक भी चार-चार अंगुल का बनाना चाहिये।
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