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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 43
शम्भोः शिरसीन्दुकला वृषध्वजोऽक्षि च तृतीयमपि चोर्ध्वम् । शूलं धनुः पिनाकं अध्मार्थे वा गिरिसुतार्धम् ॥
शिव जी की प्रतिमा के मस्तक पर चन्द्रकला बनानी चाहिये, उनकी ध्वजा में वृष का चिह्न बनाना चाहिये। उनके ललाट में खड़ा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में पिनाक नामक धनुष धारण कराना चाहिये अथवा उनकी बाई तरफ आधे भाग में पार्वती की प्रतिमा बनानी चाहिये।
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